विष को खाकर मनुष्य बच भी जाता है पर विषय-भोगी तो भोगते-भोगते स्वयं ही भुगत जाता है। आश्चर्यजनक है कि यह सब जानते हुए भी मनुष्य भोगों से नहीं हटता। यदि मनुष्य इस संसार के चक्र से छुटकारा पाना चाहता है तो उसे विषय भोगों के मोह को त्यागना होगा।
इस दृष्टि से हर वस्तु, व्यक्ति, अवस्था और परिस्थिति निरंतर हमारा त्याग कर रहे हैं। यदि अपनी ओर से उनकी ममता और कामना का त्याग कर दिया जाए तो हमें उनकी याद नहीं आएगी। हमें दुख भले ही अरुचिकर लगें मगर ये सुख आने की सुचना के प्रतीक माने जाते हैं। मनुष्य के विकास के लिए जीवन में दुखों का आना जरूरी होता है क्योंकि दुखों के समय ही मनुष्य के मन में उनसे लडकर तरक्की करने की इच्छा पैदा होती है। हम सब इतना साधन जानते हैं जितना इस जीवन में कर ही नहीं सकते और जितना करने की आवश्यकता भी नहीं है। हमारी जो रुचि साधक संबंधी चर्चा सुनने में है वह रुचि साधन करने में नहीं है। हमारी शक्ति तो सीमित ही है। यदि इस सीमित शक्ति को हमने साधन की चर्चा में ही व्यय कर दिया तो फिर साधन करने के लिए सामर्थ्य कहां से आएगा। मन की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। अपनी पसंद के प्रभाव का समूह ही मन है जिसे हम पसंद करते हैं उसके साथ हमारा मन लग जाता है और जिसको नापसंद करते हैं वहां से मन हट जाता है। कमी होते हुए कमी का अनुभव न करना परम भूल है क्योंकि इस भूल से ही सभी भूलें उत्पन्न होती है। सच्चा साधक जो सुनता है उसे अपने जीवन में उतार लेता है।
चिंता रहित होते ही साधक इंद्रियां अविषय हो जाती है। मन निर्विकल्प हो जाता है और बुद्धि सम हो जाती है। तब भोग योग में और मोह बोध में बदल जाता है जो अज्ञान को खाकर अविनाशी चिन्मय-रसरूप जीवन से अभिन्न कर देता है।
Tuesday, January 15, 2008
भगवत कृपा की ही भिक्षा मांगनी चाहिए
भगवत कृपा को उस दिन मानना चाहिए जिस दिन बिना प्रयत्न के ही कोई महापुरुष मिल जाए जो भगवान की कृपा प्राप्त करने का मार्ग समझाएं और भगवान को अपने सात्विक कर्माें से प्रसन्न कर भगवत कृपा की ही भिक्षा मांगने को उत्साहित करे।
भगवान तो सदा ही सभी को अपना स्नेह बराबर देते है और किसी भी मनुष्य में भेदभाव नहीं करते जिस तरह सूर्य अपने प्रकाश को समान रूप से सभी को देता है उसी तरह भगवान भी सभी को प्रेम व भक्ति देते है। यह मनुष्य पर निर्भर है कि वह भगवान की भक्ति में कितना समय देता है तथा कितना वह और कामों के लिए देता है। उन्होंने कहा कि भगवान को अपने सतकर्मो से प्रसन्न कर उससे सदा भगवत कृपा की ही भिक्षा मांगनी चाहिए यहीं इंसान का सात्विक धर्म है।
भगवान तो सदा ही सभी को अपना स्नेह बराबर देते है और किसी भी मनुष्य में भेदभाव नहीं करते जिस तरह सूर्य अपने प्रकाश को समान रूप से सभी को देता है उसी तरह भगवान भी सभी को प्रेम व भक्ति देते है। यह मनुष्य पर निर्भर है कि वह भगवान की भक्ति में कितना समय देता है तथा कितना वह और कामों के लिए देता है। उन्होंने कहा कि भगवान को अपने सतकर्मो से प्रसन्न कर उससे सदा भगवत कृपा की ही भिक्षा मांगनी चाहिए यहीं इंसान का सात्विक धर्म है।
दुख को मित्र मानने से ही सुख व शांति

लोग दुख से न घबराकर इसे अपना मित्र मान लें तो दुख ही सुख और शांति का परम साधन बन जाएगा।
दुख में रोना नहीं और सुख में हंसाना नहीं चाहिए बल्कि समभाव में उसका मंथन करके उसमें हमें हर परिस्थिति को सहन करने की शक्ति उपार्जन करना चाहिए। सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराज्य, मान-अपमान में एक रहने वाले इंसान संतत्वको प्राप्त करता है वहीं परमात्मा के नजर में संत है। प्रेम की पराकाष्ठा में पहुंचने के लिए दुख सहायक बनता है। क्रांति, विदुर-विदुरानी ने दुख के काटो पर चलकर ही परम शांति को पाया स्वयं प्रभु मिले। मानव जीवन में कर्म और धर्म दोनो की जरूरत पडती है, धर्म साथ कर्म को जोडे। कर्म के साथ धर्म को जोडे। दोनो ही हमारे जीवन को शांतिमय बनाने के लिए परम साधन है।अब से पांच हजार वर्ष पूर्व भाद्र पद कृष्ण पक्ष अष्टमी रोहणीनक्षत्र हर्षण योग के वृष लगन के माध्यम रात्रि में देवकी के गर्भ से श्री कृष्ण का जन्म हुआ। श्रीकृष्ण को पूर्णावतार कहा गया है। अवतार के जितने आधार है उनमें सभी अवतार भक्तों के लिए कल्याण हेतु ही हुए है। इसमें भी सर्वप्रथम, आवेशावतारवासुदेव जी के हृदय में ब्रह्म प्रकाश के रूप में प्रकट हुआ था। उस प्रकाश से स्वरूप उनका मुख्य मंडल दैदिप्यमानहो गया। वही ब्रह्म प्रकाश आवेश रूप में देवकी जी देवगुणसंपन्न थी उनके हृदय में स्थान प्राप्त कर लिया।
देवी गुणों को संगृहीत करने वाली शक्ति होने के कारण भगवान कृष्ण की जन्म दातीदेवकी कही गई। दोनों के हृदय में परमात्मा के प्रति भरपूरताही भाद्रपद मास कहा गया। उनके जीवनकाल के आधीन जीवन यापन की व्यवस्था ही कालकोठरी बन गई। काया का पंच भौतिक स्वरूप ही कारागार हुआ जिसका स्वामी कंस काया का अंश कहा गया है।
सृष्टि की सबसे अनुपम कृति है मनुष्य

मनुष्य सृष्टि की सबसे अनुपम कृति है। इसीलिए मनुष्य को चाहिए कि वह जीवन को सुधारने के लिए अच्छे कर्म करने के साथ-साथ रामनाम का जाप करे। राम नाम का जाप करने से जहां मन शुद्ध होता है वहीं इससे मनुष्य में परोपकार की भावना भी बलवती होती है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी इच्छाओं को त्याग कर दूसरों के भले ही सोचें और अपने मन को स्थिर करे। इस प्रकार सत्कर्म करने का फल उसे अवश्य मिलेगा और उसका जीवन व्यर्थ नहीं जाएगा। उन्होंने कहा कि मनुष्य द्वारा श्रेष्ठ लक्ष्य की प्राप्ति में कई बाधाएं आना स्वाभाविक है, पर मनुष्य अध्यात्म के बल पर सभी बाधाओं को आसानी से पार कर लेता है। अध्यात्म की शक्ति मनुष्य को प्रेरणा देती है कि वह कर्म फल की प्राप्ति के लिए आत्म समर्पण कर दे। साधना करने के परिणाम काफी सुखद होते है। हालांकि प्रारंभ में साधना के क्रम में मनुष्य को कुछ परेशानियों का सामना करना पडता है परंतु आखिरकार इसके परिणाम काफी सुखद होते हैं। उन्होंने कहा कि धर्म जीवन का अभिन्न अंग है और धर्म के सेवन से ही प्रकृति में परिवर्तन आता है और मनुष्य के जीवन में आध्यात्मिक ऊर्जा का आविर्भाव होता है। ईश्वर की उपासना समर्पण भाव से की जानी चाहिए और मनुष्य को चाहिए कि वह अपने अंदर के रोग-द्वेष को अपने विवेक की कैंची से काट डाले तभी कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा। इसके लिए मानव को इंद्रियों पर काबू पाना सीखना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्रियों का संचालन करना मानव को सिखाया है। इंद्रियों का संचालन ही हृदय का गोकुल है। उन्होंने कहा कि भोजन थाली में होगा तो पेट में भी होगा और अगर थाली ही खाली हो तो पेट भरने की आश छोड देनी चाहिए। कुछ लोग मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखते, लेकिन इस पूजा से ही अंदर की पूजा तक पहुंचा जा सकता है।
उन्होंने कहा कि अंदर की पूजा को जानने से पहले यानी भगवान को जानने के लिए अंदर की पूजा से पहले बाहर की पूजा काफी जरूरी है। आंखें जो बाहर देखती है उसी का ध्यान अंदर करती है। इसी प्रकार से कान बाहर से सुनकर उसका अंदर चिंतन करते है इसलिए पूजा की जोत की ज्वाला शरीर के बाहर तक ही नहीं बल्कि अंदर तक भी जाना जरूरी है।
Sunday, September 16, 2007
Dosti ka rishta
"अनमोल मोती"

चिरागों से अगर अँधेरा दूर होता,
तो चाँद की चाहत किसे होती.
कट सकती अगर अकेले जिन्दगी,
तो दोस्ती नाम की चीज़ ही न होती.
कभी किसी से जीकर ऐ जुदाई मत करना,
इस दोस्त से कभी रुसवाई मत करना,
जब दिल उब जाए हमसे तो बता देना,
न बताकर बेवफाई मत करना.
दोस्ती सची हो तो वक्त रुक जता है
अस्मा लाख ऊँचा हो मगर झुक जता है
दोस्ती मे दुनिया लाख बने रुकावट,
अगर दोस्त सचा हो तो खुदा भी झुक जता है.
दोस्ती वो एहसास है जो मिटती नही.
दोस्ती पर्वत है वो, जो झुकता नही,
इसकी कीमत क्या है पूछो हमसे,
यह वो "अनमोल मोती" है, जो बिकता नही . . .
सची है दोस्ती आजमा के देखो..
करके यकीं मुझपर मेरे पास आके देखो,
बदलता नही कभी सोना अपना रंग ,
चाहे जितनी बार आग मे जला के देखो |
Wednesday, September 12, 2007
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