
लोग दुख से न घबराकर इसे अपना मित्र मान लें तो दुख ही सुख और शांति का परम साधन बन जाएगा।
दुख में रोना नहीं और सुख में हंसाना नहीं चाहिए बल्कि समभाव में उसका मंथन करके उसमें हमें हर परिस्थिति को सहन करने की शक्ति उपार्जन करना चाहिए। सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराज्य, मान-अपमान में एक रहने वाले इंसान संतत्वको प्राप्त करता है वहीं परमात्मा के नजर में संत है। प्रेम की पराकाष्ठा में पहुंचने के लिए दुख सहायक बनता है। क्रांति, विदुर-विदुरानी ने दुख के काटो पर चलकर ही परम शांति को पाया स्वयं प्रभु मिले। मानव जीवन में कर्म और धर्म दोनो की जरूरत पडती है, धर्म साथ कर्म को जोडे। कर्म के साथ धर्म को जोडे। दोनो ही हमारे जीवन को शांतिमय बनाने के लिए परम साधन है।अब से पांच हजार वर्ष पूर्व भाद्र पद कृष्ण पक्ष अष्टमी रोहणीनक्षत्र हर्षण योग के वृष लगन के माध्यम रात्रि में देवकी के गर्भ से श्री कृष्ण का जन्म हुआ। श्रीकृष्ण को पूर्णावतार कहा गया है। अवतार के जितने आधार है उनमें सभी अवतार भक्तों के लिए कल्याण हेतु ही हुए है। इसमें भी सर्वप्रथम, आवेशावतारवासुदेव जी के हृदय में ब्रह्म प्रकाश के रूप में प्रकट हुआ था। उस प्रकाश से स्वरूप उनका मुख्य मंडल दैदिप्यमानहो गया। वही ब्रह्म प्रकाश आवेश रूप में देवकी जी देवगुणसंपन्न थी उनके हृदय में स्थान प्राप्त कर लिया।
देवी गुणों को संगृहीत करने वाली शक्ति होने के कारण भगवान कृष्ण की जन्म दातीदेवकी कही गई। दोनों के हृदय में परमात्मा के प्रति भरपूरताही भाद्रपद मास कहा गया। उनके जीवनकाल के आधीन जीवन यापन की व्यवस्था ही कालकोठरी बन गई। काया का पंच भौतिक स्वरूप ही कारागार हुआ जिसका स्वामी कंस काया का अंश कहा गया है।
No comments:
Post a Comment