विष को खाकर मनुष्य बच भी जाता है पर विषय-भोगी तो भोगते-भोगते स्वयं ही भुगत जाता है। आश्चर्यजनक है कि यह सब जानते हुए भी मनुष्य भोगों से नहीं हटता। यदि मनुष्य इस संसार के चक्र से छुटकारा पाना चाहता है तो उसे विषय भोगों के मोह को त्यागना होगा।
इस दृष्टि से हर वस्तु, व्यक्ति, अवस्था और परिस्थिति निरंतर हमारा त्याग कर रहे हैं। यदि अपनी ओर से उनकी ममता और कामना का त्याग कर दिया जाए तो हमें उनकी याद नहीं आएगी। हमें दुख भले ही अरुचिकर लगें मगर ये सुख आने की सुचना के प्रतीक माने जाते हैं। मनुष्य के विकास के लिए जीवन में दुखों का आना जरूरी होता है क्योंकि दुखों के समय ही मनुष्य के मन में उनसे लडकर तरक्की करने की इच्छा पैदा होती है। हम सब इतना साधन जानते हैं जितना इस जीवन में कर ही नहीं सकते और जितना करने की आवश्यकता भी नहीं है। हमारी जो रुचि साधक संबंधी चर्चा सुनने में है वह रुचि साधन करने में नहीं है। हमारी शक्ति तो सीमित ही है। यदि इस सीमित शक्ति को हमने साधन की चर्चा में ही व्यय कर दिया तो फिर साधन करने के लिए सामर्थ्य कहां से आएगा। मन की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। अपनी पसंद के प्रभाव का समूह ही मन है जिसे हम पसंद करते हैं उसके साथ हमारा मन लग जाता है और जिसको नापसंद करते हैं वहां से मन हट जाता है। कमी होते हुए कमी का अनुभव न करना परम भूल है क्योंकि इस भूल से ही सभी भूलें उत्पन्न होती है। सच्चा साधक जो सुनता है उसे अपने जीवन में उतार लेता है।
चिंता रहित होते ही साधक इंद्रियां अविषय हो जाती है। मन निर्विकल्प हो जाता है और बुद्धि सम हो जाती है। तब भोग योग में और मोह बोध में बदल जाता है जो अज्ञान को खाकर अविनाशी चिन्मय-रसरूप जीवन से अभिन्न कर देता है।
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