सभ्य समाज में स्त्री और पुरुष के बीच के संबंधों को बडी सतर्कता से परिभाषित किया गया है। इसके अनुसार समान आयु की अपरिचित महिला बहन के समान, छोटी पुत्री के समान और बडी महिला को माता के समान माना जाता है। ये सुसंस्कृत विचार शिक्षा के ही परिणाम हैं।
पंडित जी ने कहा कि शास्त्रों में दी गई इस मान्यता के अनुसार आचरण स्वत: नहीं बन जाता है अपितु इसके लिए निरंतर प्रयास करना पडता है। जिस समाज में बच्चों के अंदर उत्तम संस्कारों के डालने का प्रयास नहंी किया जाता और उचित शिक्षा नही दी जाती, वहां समाज असभ्य,असंस्कृत और जंगली हो जाता है। भारत में प्राचीन काल से इसी परिभाषा के अनुसार आचरण किया जाता है। पर अब धीरे-धीरे पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव के कारण लोगों का आचरण बिगडने लगा है। लोगों के आचरण में परिवर्तन आने के कारण समाज का ढांचा चरमराने लगा है। जहां एक ओर नारी को समानता दिए जाने की बातें की जा रही हैं और उसे आगे बढने के अवसर प्रदान करने के प्रयास किए जा रहे हैं वहीं नारी का जीवन पहले की अपेक्षा अधिक असुरक्षित होता जा रहा है। पश्चिमी सभ्यता के पीछे अंधी दौड के कारण लोगों के मानसिकता विकृत होने लगी हैं। इसके कारण अपराधों की संख्या बढ रही है। विशेष रूप से यौन अपराधों में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हो रही है। एक समय था जब भारत पर राज्य करने वाले राजा अश्वपति ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि उनके राज्य में न तो कोई चोर है और न ही कोई व्यभिचारी पुरुष है। जब पुरुष व्यभिचारी नहीं है तो व्यभिचारिणी स्त्री तो हो ही नहीं सकती। पर आज उसी राजा अश्वपति के देश में व्यभिचार के हजारों मुकदमे अदालतों में चल रहे हैं।
भारत वासियों को पश्चिमी देशों का अंधानुकरण छोड अपने पूर्वजों के आचरण का अनुकरण करके देश को दोबारा ऊंचाइयों की ओर ले जाने के प्रयास करना चाहिए। तब ही भारत फिर से जगद्गुरु कहला सकेगा।
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